इस कामधेनु की रक्षा,समाज का दायित्व हैं*

इस कामधेनु की रक्षा,समाज का दायित्व हैं*
 अशोक वशिष्ठ  :
पिछले कुछ दिनों से देश के आर्थिक गलियारों में बैंकों के नीजिकरण की खबरें सुनायीं पड़ रही हैं। अखबार तथा साइबर मीडिया में बनीं सुर्खियों से बैंकों के श्रमिक संगठनों तथा नीजिकरण  विरोधियों के कान खड़े होना स्वा’भाविक हैं। आपदा वर्ष 2020 में राष्ट्र चौतरफा संकटों से घिरा हुआ है, शासन को संयम से काम लेना चाहिए। लेकिन मोदी सरकार अपने धमाकेदार निर्णयों से चौंकाती रही है। अर्थव्यवस्था में बैंकों की भूमिका,शरीर में धमनियों की भूमिका के समान ही महत्वपूर्ण है।धमनियां शरीर के प्रत्येक अंग को रक्त की आपूर्ति करती हैं तथा अशुद्ध रक्त को शुद्ध करके पुनः संचारित करने का कार्य भी धमनियां ही करती हैं। ठीक ऐसे ही ,अर्थव्यवस्था में बैंकों की भूमिका, शरीर में धमनियों की भूमिका के समान है।  भारत के संविधान की प्रस्तावना में निहित ‘समाजवादी , कल्याणकारी , लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना ‘ के संकल्प का भी महत्व है।
इसके अतिरिक्त भारतीय संविधान में राज्य की नीति के निदेशक सिद्धातों को भी शामिल किया गया है। नीति  निर्देशक सिद्धांत संविधान द्वारा केन्द्र तथा राज्य सरकारों को दिए वे निर्देश हैं जिनकों ध्यान में रखतें हुए, सरकारें नीतियां बनायेगी। अतः चाहें किसी भी दल या गठबंधन की सरकार हों उनसे स्वतंत्रता, समानता तथा शोषण रहित समाज की स्थापना के उद्देश्य से नीतियां बनाने की अपेक्षा की जाती है। संविधान की प्रस्तावना में संकल्पित प्रतिज्ञा को पूरा करने में ,राष्ट्रीयकृत बैंकों   की भूमिका उत्प्रेरक सिद्ध हुई है।इस वर्ष सात राष्ट्रीयकृत बैंको का अन्य राष्ट्रीयकृत बैंकों में विलय किये जाने से सरकारी बैंकों की संख्या घट कर बारह रह गई है। भले ही सरकारी बैकों की संख्या कम  हो गई , लेकिन एनपीए की राशि तो बढ़ ही रही हैं । वरिष्ठ नागरिक ग्राहकों को परेशानियों भी झेलनी पड़ी हैं।
19 जुलाई 1969 से पूर्व भारतीय रिज़र्व बैंक तथा भारतीय स्टेट बैंक को छोड़ कर सभी नीजि बैंक ही होते थे।1951 में कमर्शियल बैंकों की कुल संख्या 566 थी।जो 1956 में घट कर  423 रह गई थी।1961 में 292 तथा 1969 में राष्ट्रीयकरण के समय मात्र 89 बैंक ही बचे थे।(स्रोत रिजर्व बैंक ऑकेजनल पेपर्स वॉल्यूम 18 ऑफ1997) इसमें स्टेट बैंक तथा तत्कालीन उसके सहायक बैंकों की संख्या शामिल नही हैं।सपष्ट है ,मात्र19 वर्ष केअंतराल में 477 बैंक देश के आर्थिक पटल से गायब हो गए थे। जो बंद हो गए थे या दिवालिया हो गए थे। विलुप्त हुए  बैंकों के ग्राहकों के दुख तथा आर्थिक नुकसान को सांझा करने वाला कोई न था। क्योंकि ये नीजि बैंक थे। उस समय बड़े बड़े उद्योगपति ही बैंकों के स्वामी होते थे। सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया टाटा समूह का, युनाइटेड़ कमर्शियल बैंक लि.( यूको बैक) बिरला ग्रुप का, बैंक ऑफ बड़ौदा वालचंद हीराचंद समूह, इंडियन बैंक चेटियार परिवार, ओरियंटल बैंक आफ कामर्स थापर ग्रुप तथा पंजाब नेशनल बैंक बजाज समूह का होता था। ग्राहकों की छोटी छोटी जमा राशियों से बड़ी पूंजी जुटा कर अक्सर बड़े बड़े औद्योगिक घरानों को ही ऋण दिए जाते थे।आम आदमी बैंक में प्रवेश करने से भी डरता था। ऋण मिलना तो दूर की कौड़ी थी। परंपरागत कुटीर उद्योग, कृषि, पशुपालन , मत्स्य पालन व अन्य जीविका के साधनों को बढ़ावा नही मिल पाता था। बैंकों का उद्देश्य केवल लाभ कमाना था। समाज के उत्थान व विकास से उनका कोई सरोकार न था।अतः कृषक,खेतिहर मजदूर,कुटीर उद्योगकर्ता, ऋण की आवश्यकता होने पर ‘सूदखोर’ महाजनों के पास जाने को मजबूर होते तथा सदा के लिये महाजनों के चुंगल में फंस जाते थे। सुप्रसिद्ध लेखक मुंशी प्रेमचंद ने  ‘गोदान’ के मुख्य पात्र ‘होरी’ तथा ‘धनिया’ के माध्यम से सूदखोर महाजन के ऋण जाल में फंसें खेतिहर मजदूरों का मार्मिक चित्रण किया है। सच्चिदानंद वात्सायन अज्ञेय ने भी अपनी कविता में छोटे किसानों तथा खेतिहरों कारुणिक दृश्य खींचा है
बह चुकी बहकीं हवाएं चेत की
 कट चुकी  पूलें  हमारे खेत की
कोठरी में लौं बढ़ा कर दीप की
गिन रहा होगा,महाजन सेतकी ( अज्ञेय)
खैर नीजि बैंकों के मालिक समाज सुधारक नही थे ,न ही वे संवेदनशील साहित्यकार थे। वे अपनी संपदा व कारोबार बढ़ाने में ही मशगूल रहते थे। अतः उन्होंने बैंकों की शाखाएं भी अपनी सोच के अनुसार ही खोली थी। 30 जून 1969 में बैंकों के राष्ट्रीयकरण से पूर्व बैंकों की कुल 8262 शाखाएं थी। उस समय देश की 80% आबादी गांवों मे निवास करती थी। बैंकों की ग्रामीण शाखाओं की संख्या मात्र 1833 थी, मैट्रो में 1503 ,शहरी 1584 तथा अर्द्ध शहरी शाखाओं की संख्या 3342 थी। 30 जून 1969 तक , बैंकों ने कृषि व प्राथमिक क्षेत्र  को कुल 260 करोड़ रूपये की राशि के ऋण दिए थे। जो कुल ऋणों का मात्र 7.42% था। जबकि राष्ट्रीयकृत बैकों ने जून 2020 तक कृषि तथा प्राथमिक क्षेत्र को कुल ऋणों का 40.72% की राशि के ऋण आवंटित किये है। उपरोक्त आंकड़े बैंकों के राष्ट्रीयकरण से पूर्व तथा राष्ट्रीयकरण के बाद की बैंकों की सोच व कार्यशैली में आये, बदलाव के द्योतक है। बैंकों के राष्ट्रीयकरण से पूर्व भारतीय अर्थव्यवस्था में बैंकों की भूमिका में चाहें जो भी चूकें हुई हो, लेकिन बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद से राष्ट्रीयकृत बैंक देश व समाज के उत्थान एवम् विकास में प्राणपण से जुटें है।
दूसरी ओर निजी बैंक अपनी नीयत व नीतियों के चलते ग्रामीण शाखाओं का विस्तार न करने के कारण,जन साधारण से जुड़ न सकें।राष्ट्रीयकृत बैंक में देश क्रमशः ‘हरित’ व ‘श्वेत ‘क्रांति के ध्वजवाहक रहें हैं। छोटे छोटे किसानों को, कृषि भूमि को समतल करनें, सिंचाई  के साधन कुएं, रहट, टयूबवैल लगवाने, खाद , बीज ,बैल या ट्रैक्टर खरीदने , खेतिहर मजदूरों को आवश्यक उपकरण खरीदने तथा पशुपालकों को गाय,भैंस, बकरी, ऊँट आदि  खरीदनें तथा बेरोजगार युवकों को स्वावलंबी बनाने के लियें , ऋण सुविधाएं उपलब्ध कराने में अग्रणी रहें है। 1990 के दशक में विश्व में नयें आर्थिक  सुधारों के साथ, देश में भी नई आर्थिक नीतियों का आगाज़ हुआ। नई आर्थिक नीतियों से कदम ताल करते हुए , बैंक शाखाओं का कम्प्यूटरीकरण करके ग्राहकों को नई नई तकनीकों से अवगत करा कर बैंकिंग में त्वरित सेवाएं उपलब्ध करा कर, ग्राहक सेवाओं में अपेक्षित सुधार किया । सरकार की नीतियों व योजनाओं को धरातल पर साकार करने के लिए, जनधन खातों को खोल कर जन जन को बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ा तथा भारत सरकार की विमुद्रीकरण योजना को तय समय में अमलीजामा पहनानें में राष्ट्रीयकृत बैंकों ने दिन रात एक कर दिया था।खाद्यान्न के मामले में देश को आत्मनिर्भर बनाने में राष्ट्रीयकृत बैंकों की महत् भूमिका रही है। निसंदेह राष्ट्रीयकृत बैंक राष्ट्र तथा समाज के लिए कामधेनु  सिद्ध हुए हैं। लेकिन विगत कुछ वर्षों से सरकार की सोच तथा नीतियों में परिवर्तन आया हैं । विश्व में पूंजीवाद की बयार के चलते,  संविधान में निहित ‘कल्याण कारी राज्य की स्थापना ‘ के संकल्प वाक्य को भुलाने का प्रयास किया जा रहा है। ध्यान रहें, आर्थिक सुधारों की परिभाषा में जब तक गरीब आदमी शामिल न हो, तब तक आर्थिक सुधारों या आर्थिक नीतियों की सफलता असफलता का कोई अर्थ नही हैं। सामाजिक विकास के बिना आर्थिक विकास बेमानी हैं।राज्य की स्थापना भी ‘सामाजिक समझौते’ के आधार पर हुई थी।स्वस्थ व सुंदर समाज की स्थापना में राज्य का योगदान होना ही चाहिए। वितीय संस्थाओं का नीजिकरण करके, सरकार सामाजिक विकास के दायित्व से पल्ला झाड़ना चाहती है। यह राज्य की स्थापना के आधारभूत ‘सामाजिक समझौतें के सिद्धांत’ के विरुद्ध है I बैंकों में बढ़ते एनपीए को आधार बना कर ,बैंकों के नीजिकरण की दलीलें दी जा रही हैं। नीजिकरण के समर्थकों का कहना है कि मुक्त अर्थव्यवस्था के दौर में राष्ट्रीयकृत बैंकों को सरकार का संरक्षण नही मिलना चाहिए। उनके मत्तानुसार राष्ट्रीयकृत बैंक सफेद हाथी सिद्ध हुए हैं। सुरसा के मुँह की तरह बढ़ते बैंक घाटे को पाटने के लिये अरबों रुपये की सहायता राशि का बजट में प्रावधान करना पड़ता है। हमारे बजट पहले से ही घाटे के होते है । उपर से सरकारी बैंकों के घाटे को पाटने के लिये,करदाताओं की खून पसीने की कमाई से , परोक्ष रूप से उन्हीं लोगों को लाभ पहुँचाया जाता है,जो बैंकों के अग्रिम नही लौटाते।क्या देश के उन होनहार लक्ष्मीपुत्रों की देनदारियों को करदाता के पैसे से चुकाना उचित है? यह तो जनता की आँखों मे धूल झोंकना ही तो हुआ। इस तरह राष्ट्रीयकरण की आड़ में राजनेताओं, पूंजीपतियों तथा . अफसरशाही का हित साधन हैं, राजकोष की खुली लूट है। वे कहते है, बैंकों को सरकार का संरक्षण ही बैंकों मे भ्रष्टाचार का मूल है। व्यापार करना सरकार का कार्य नहीं होना चाहिए। अतः सरकार को राष्ट्रीयकृत उद्यमों को नीजि हाथों में सौंप देना चाहिए तथा सरकार का कार्य केवल शासन तक ही सीमित रहना चाहिए। इन चतुरसुजानो के मासूम , नादान सुझावों पर हँसे या रोएं ? प्रश्न यह है कि यदि बाल्टी में पानी डालते रहें और उसके पेंदें के छिद्र से पानी का रिसाव हो रहा है, उसे बंद करने का दायित्व किसका है ?  क्या सरकार पेंदें के छिद्र को रोकने में अक्षम है ? ऐसे तो जितना चाहें पानी बाल्टी में उड़ेलतें रहिए, बर्तन खाली होता ही रहेंगा। वास्तव में राजनैतिक स्वार्थ के चलते कोई भी सरकार ‘कारपोरेट’ ऋण चूककर्ताओं से सख्ती से पेश नही आती है। बैंकों के श्रमिक संगठन राष्ट्रहित में बैंकों के ऋण वापस न करने वाले उद्योगपतियों के नामों की सूची जारी करने की मांग करते रहते है। लेकिन वित्त मंत्रालय तथा रिज़र्व बैंक , इसे अनसुना कर देते है। देश की अर्थव्यवस्था की चिंताओं से दुबले हुए उद्यमियों के संगठन फिक्की, ऐसोचैम व सी.आई.आई. इस विषय में मौन क्यों रहते है? बैंकों में निरन्तर बढ़ते घाटे का   रोना   रोने वाले  उद्योगपतियों के संगठनों को भी  ‘बैंक ऋण डिफाल्टर्स ‘ सदस्यों के नामों की सूची  निवेशकों के सामने लानी चाहिए या सरकार से स्वैच्छिक चूककताओं के नामों की सूची प्रकाशित करने का सुझाव देना चाहिए । सरकार  स्वैच्छिक चूकर्ताओं के नामों की सूची सार्वजनिक क्यो नही करती ? यह रहस्यमय बिंदु है। जिस पर सरकार भी मौन हैं तथा उद्योगपतियों के समूह भी चुप्पी साधे है । राजनीतिक दल भी इस विषय को तरजीह नही देते। इस रहस्य से पर्दा उठना चाहिए Iसरकारी अफसरशाही, प्रशासनिक विफलता, राजनैतिक महत्वाकांक्षाएं तथा उच्चस्तर पर पदासीन बैंकों के भ्रष्ट अधिकारियों की जांच होनी चाहिए। जांच इस बात की भी होनी चाहिए कि सार्वजनिक धन से किस-किसकी देनदारियां चुकाई गई तथा ऐसे उद्योगपतियों ने किस- किस राजनैतिक दल को कितना कितना धन चंदें के रूप में उपलब्ध कराया । बैंकों के आर्थिक संकट की तह में यही मूल बिंदु है, जहाँ पर सभी राजनैतिक दलो की जुबान पर तालें पड़ जाते है ।बात बात में सरकारी बैंकों के नीजिकरण की सलाह देने वाले ‘चतुरसुजान’ सलाहकारों को. इतिहास से सबक लेना चाहिए’ । ‘बीसीसीआई’ , ‘लेहमैन ब्रदर्स’ जैसे विश्वस्तरीय बैंक नीजि क्षेत्र के ही बैंक थे। उनके पतन ने विश्व के वित्तीय बाजारों को हिला कर रख दिया था। पिछले दशक में अमेरिका के विश्वस्तरीय बैंकों के ताश के पतो की तरह ढह जाने को लोग आजतक नही भुला पायें है। हमारे देश में ही बैंकों के राष्ट्रीयकरण से पूर्व तथा राष्ट्रीयकरण के बाद नीजि बैंकों की असफलता की एक लम्बी फेहरिस्त हैं। यदि ‘राष्ट्रीयकृत बैंकों ‘ का नीजिकरण ही एकमात्र ‘सर्वरोगहारिणी ‘दवा है, तो ‘ग्लोबल ट्रस्ट बैंक , हिन्दुस्तान कमर्शियल बैंक , लक्ष्मी कमर्शियल बैंक, बैंक ऑफ तमिलनाड  तथा अन्य नीजि क्षेत्र के  बैंकों का विलय राष्ट्रीयकृत बैंकों में न करना पड़ता। इस वर्ष ‘यश बैंक ‘ संकट से जमा कर्ताओं तथा निवेशकों के होश फाख्ता हो गये थे। यश बैंक संकट ने कारपोरेट प्रशासन की कुशलता पर भी प्रश्न चिह्न लगा दिया। यश बैंक के निदेशक मंडल में दो अत्यन्त महत्वपूर्ण नामों, श्री उत्तम प्रकाश अग्रवाल (भू.पू. अध्यक्ष इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टड एकाउंटेटस ) तथा श्री आर. गांधी (पूर्व. डिप्टी गर्वनर, भारतीय रिज़र्व बैंक ) के होते हुए भी, यश बैंक के साथ इतने कांड हो गये। यश बैंक कोई छोटा बैंक तो हैं नही, देश भर में इसकी 1000 शाखाएं हैं तथा 1800  एटीएम हैं। भला इतने बड़े बैंक को सरकार तथा रिज़र्व बैंक , कैसे फेल होने देते? अतः सरकार ने यश बैंक के पुनर्गठन की अधिसूचना जारी की तथा भारतीय स्टेट बैंक को इस बैंक मे दस हजार करोड़ का पूंजी निवेश करना पड़ा तथा भारतीय स्टेट बैंक की साख का लाभ, यश बैंक को भी मिला। प्रश्न यह है कि राष्ट्रीयकृत बैंकों का भी नीजिकरण कर दिया तो फिर उनके फेल होने की स्थिति में, जमा कर्ताओं / निवेशको का क्या होगा। आम जनता ही बैंकों में बचत की राशि जमा करवाती है। जमा राशियों से ही बड़ी पूंजी का निर्माण होता है, बैकं उसी पूंजी को अग्रिम के रूप में उद्यमियों को ,उद्योग चलाने या स्थापित करने के लिए देते है । राष्ट्रीयकृत बैंकों की साख तथा जमाकर्ताओं  का सरकारी बैकों में विश्वास पूंजी जुटाने में सहायक रहा है। यदि एक बार जमाकर्ताओं / निवेशकों का बैंकों से विश्वास हिल गया तो नये उद्यमियों को पूंजी के भी लाले पड़ जायेगें। दुनियां के अमीरों में शामिल होने अर्थात फोबर्स लिस्ट में नाम लिखवाने के सपनों के लिये जनता की छोटी छोटी जमा राशियां ही सोपान बनती है।अतः राष्ट्रीयकृत बैकों के निजीकरण का मामला अत्यंत संवेदनशील  हैं। सरकार को राष्ट्रीयकृत बैकों के बढ़ते एनपीए पर अंकुश लगाना होगा। स्वैच्छिक चूककर्ताओं के साथ सख्ती से पेश आना होगा। देश में भ्रष्टाचार ‘अंगद का पांव’ बन गया जो हिलाएं नही हिल रहा है। बैंकों में एनपीए  भ्रष्ट राजनेताओं, भ्रष्ट उद्योगपतियों, भ्रष्ट अधिकारियों द्वारा पोषित व संरक्षित भ्रष्टाचार हैं। सरकार को, बैंकों के ऋण न लौटाने वाले स्वैच्छिक चूक कर्ताओं तथा संलिप्त भ्रष्ट बैंक अधिकारियों के विरुद्व  ‘आर्थिक अपराध ‘ कानून के अन्तर्गत कारवाई  तथा कठोरतम दंड का प्रावधान करना होगा। सार्वजनिक धन की सुरक्षा करना, सरकार का  दायित्व है तथा ‘राजधर्म ‘ भी है। जनता को  कामधेनु के सदृश राष्ट्रीयकृत बैकों को बचाने के लिये आगे आना चाहिए ।(फोटो :साभार नवभ्रत टाइम्स):
अशोक वशिष्ठ :
ashok.vasshisth22@gmail.com
Disclaimer: The opinion expressed in this article are the personal opinions of the writer/author.The facts and opinions appearing do not reflect the views of www.tribunenewsline.com does not assure any responsibility or liability for the same.

About the author

SK Vyas

SK Vyas

Add Comment

Click here to post a comment

All Time Favorite

Categories