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जनसांख्यकीय आक्रमण यह आज की समस्या नहीं है तुफ़ैल चतुर्वेदी

जनसांख्यकीय आक्रमण यह आज की समस्या नहीं है तुफ़ैल चतुर्वेदी
योरोप आजकल विकट दबाव में है। इस्लामी देशों से उस पर लगातार जनसांख्यकीय आक्रमण हो रहा है। यह आज की समस्या नहीं है बल्कि सौ-दो सौ वर्ष से अधिक समय से योरोप में इस्लामी आव्रजन हो रहा है। योरोप के अनेकों देशों ने विश्व भर में कॉलोनियाँ बनायीं थीं।
कॉलोनी बनने वाले देश के निवासी कॉलोनी बनाने वाले देश में जा कर बस सकते थे और ऐसा तभी से होता रहा है। इसी को देखते हुए बहुत समय पहले कई इस्लामी चिंतकों के अतिरिक्त वामपंथी माने जाने वाले लीबिया के कर्नल ग़द्दाफ़ी ने भी कहा था कि एक दिन योरोप इस्लाम के झंडे तले आ जायेगा।
जनसांख्यकीय आक्रमण यह आज की समस्या नहीं है तुफ़ैल चतुर्वेदी
इस समस्या से निबटने के लिये योरोप में कई प्रकार से चिंतन हो रहा है। रणनीतियाँ बनायी जा रही हैं। इसी के तहत योरोप में आज कल एक और मुहिम भी चलायी जा रही है।
“Teach your children to be tolerant” अख़बारों में, स्कूलों में, स्थानीय कम्यूनिटी केंद्रों में, यूनिवर्सिटी में इस विषय पर चर्चा हो रही है। लोग भाषण तैयार कर रहे हैं। बहसें चलायी जा रही हैं। एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाया जा रहा है कि आप अपने बच्चों को सहिष्णु बनायें। इसमें यह बात बिलकुल इग्नोर, अवहेलित हो रही है कि आज के योरोपीय बच्चे क्या असहिष्णु हैं भी ?
कोई पूछ ही नहीं रहा कि उनके असहिष्णु होने के क्या प्रमाण हैं ? अब सवाल उठता है तो फिर बिना प्रमाण दिए यह बहस चलायी क्यों जा रही है, चलायी कहाँ से जा रही हैं ? इससे क्या लक्ष्य साधा जा रहा है ?
यहाँ यह जानना उचित होगा कि इटैलियन माफ़िया के अलिखित नियमों में से एक यह भी था “जहाँ कोई कारण दिखाई नहीं दे रहा वहाँ बहुत बड़ा कारण होता है”
मित्रो! यह सॉल अलिंस्की  की एक विषैली तकनीक का कारगर उपयोग है। 1950 के दशक में अमरीकी वामपंथ का का एक बड़ा नाम सॉल अलिंस्की था। उसने अमरीकी वामपंथ के लिये संघर्षों की तकनीक सँवारी और इन्हीं अनुभवों का सार अपनी किताब “रूल्स फॉर रेडिकल्स” में दिया। यह किताब संसार भर के वामपंथियों में रणनीतिक बाइबिल की तरह देखी-पढ़ी-मानी जाती है। इस किताब में रणनीतिक नियम दिए गए हैं। उनमें से एक यह भी है “लगातार दबाव बनाये रखने की प्रक्रिया ही रणनीति का मुख्य बिंदु है। इसी दबाव में शत्रु प्रतिक्रिया देता है और इन्हीं प्रतिक्रियाओं से राजनीतिक अवसर निकलते हैं”
योरोप ने विश्व को वर्तमान प्रजातंत्र, तटस्थ न्याय प्रणाली, लिखित दंड विधान, स्त्री-पुरुष के बराबरी के अधिकार, विकास की अन्यान्य प्रक्रियाएं दी हैं। उसी योरोप के विभिन्न देशों में “Teach your children to be tolerant” का मुद्दा बहस का केंद्र बनाया जा रहा है। इस्लामी आव्रजक जो इस्लामी क्षेत्र मौला का मक्का-मदीना, क़ुरआन के नीति-निर्देशों के तहत चलने वाले राज्य अर्थात शरिया शासित क्षेत्र को छोड़ कर आये हैं, अब योरोप में आ कर उसी त्यागे हुए देश की शरिया प्रणाली, हलाल माँस, पर्दा इत्यादि की मांग कर रहे हैं। उन्हीं के दबाव में यह बहसें चलायी जा रही हैं।
कोई यह नहीं पूछ रहा कि अफ़ग़ानिस्तान, सीरिया, लीबिया, यमन, ईराक़, अल्जीरिया इत्यादि देशों की दुर्गति में फ़्राँस, जर्मनी, इंग्लैंड, स्वीडन आदि योरोपीय देशों का क्या योगदान है जो अब इसका ख़ामियाज़ा हमें भुगतना पड़ रहा है ? आख़िर हमारे बच्चों को “Teach your children to be tolerant” क्यों बताया जा रहा है ? क्या हमने एक भरे-पूरे देश क़ुवैत पर रातोंरात क़ब्ज़ा किया था जिसके कारण Gulf War हुई और परिणामस्वरूप संयुक्त राष्ट्र संघ के नेतृत्व में ईराक़ की पराजय हुई ? क्या हम ने तालिबान, अल क़ायदा, बोको हराम, आई एस आई एस बनाया ? क्या हमारे बच्चे सारी दुनिया से इकट्ठे हो कर दाइश में भर्ती होने गए ? क्या हमारी औलादों ने 6-6, 7-7 साल की बच्चियों को चेनों से बांध कर मंडियों में लौंडी { Sex Slave } बना कर बेचा ?
यदि ऐसा नहीं है तो फिर योरोप में इस “Teach your children to be tolerant” का क्या मतलब है ?
एक इस्लामी चिंतक ने एक बार योरोपीय नेताओं के सामने कहा था। “हम तुम्हारी नीतियों से तुम पर बढ़त बनाएंगे और फिर अपनी नीतियों से तुम पर विजय प्राप्त कर लेंगे”। यही तकनीक तो दशकों से भारत में प्रयोग होती रही है ? आपका क्या विचार है ?
तुफ़ैल चतुर्वेदी  ( tufailchaturvedi@gmail.com):

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