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डॉ.जे.एस. यादव की कविताओं में सामाजिक सरोकार

डॉ.जे.एस. यादव की कविताओं में सामाजिक सरोकार

 

डॉ.जे.एस. यादव पेशे से भले ही जीव वैज्ञानिक थे, मगर वास्तव में वे समाजवादी चिंतक थे| उनके जीवन पर महर्षि दयान्द सरस्वती जी का बहुत प्रभाव था| इसलिए डॉ साहब आजीवन शोषित, वंचित, दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक और महिलाओं के पक्ष में संघर्षरत रहे| वे चाहते थे कि समाज से गैर-बराबरी और आर्थिक असमानता दूर हो ताकि सभी लोग स्वाभिमान और स्वतंत्रता के साथ जी सकें| जिस विचारधारा को लेकर वे चले वही उनकी रचनाओं में दृष्टिगोचर होती है| उनकी कवितायेँ भी सामाजिक सरोकारों से जुडी हैं|

एक तरफ वंचित तबके के भूखे बच्चों को झूठन तक नसीब नहीं होती वहीँ दूसरी तरफ संपन्न लोग निर्जीव मूर्तियों तक को दूध से नहलाते हैं तो कवि का मन तड़प उठता है|

दूध से नहाये देखो भीतर

पत्थर का इनका भगवान

झूठन तक को तरसे बाहर

क्षुधा पीड़ित बालक नादान||

 

डॉ.साहब समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद को गैर-बराबरी का प्रमुख कारण मानते थे| इसलिए उनका कवि हृदय संसाधनों की बंदरबांट और गरोबों की हकतलफी से आहत होता था| इसी स्थिति पर व्यंग्य करते हुए वे लिखते हैं-

हमने समूल मिटा दी है

गरीबी, भूखमरी, बेकारी

स्वजनों को बांटे हैं-

कोटे, परमिट, नौकरियां

अपनी ही गरीबी न मिटी

तो देश की कैसे मिटेगी||

नारी की पूजा करने वाले देश में ही नारी सबसे ज्यादा उत्पीडित और असुरक्षित है| डॉ साहब को समाज का यह दोगलापन कतई पसंद नहीं था| एक तरफ नारी आकाश की बुलंदियां छू रही है, वहीँ दूसरी तरफ अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है| कवि चाहता है कि भले ही नारी की पूजा न हो मगर उसे सम्मान का स्थान मिले| आज स्थिति क्या है-

नारी आज स्वतंत्र है

अपने पांवों पर खड़ी है

और

जीवन के हर क्षेत्र में

मर्दों से कहीं आगे बढ़ी है

क्या कहा- बलात्कार

दहेज़

नव-वधु दहन

अजी छोडिये

त्रेता में भी तो

सीता ने दी थी अग्नि-परीक्षा ||

आज समाज में अमीर-गरीब की खाई बहुत गहरी हो चुकी है| एक तरफ पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण करने वाले धनी लोग हैं जिनके लिए नैतिक मूल्यों तक का कोई महत्त्व नहीं है, तो दूसरी तरफ रोटी-कपड़ा और मकान के लिए तरसता आम आदमी है| कवि आर्थिक विषमता पर प्रहार करते हुए कहता  है-

रेशमी परिधान से लदी

चिंतित है एक, निर्वसना हो कैसे?

उभरते यौवन को लीरें लपेटती

चिंतित है एक, लाज ढके कैसे?

क्या उसके हित तनिक सा कपडा

कोई भी मिल बना न पाती

क्या लिखूं मैं आज साथी?

नैतिक मूल्य किसी भी समाज की उन्नति के लिए नीवं का पत्थर होते हैं| लेकिन आपाधापी और धन की अंधी दौड़ वाले इस युग में आदमी चाहता है केवल पद और पैसा | राजनीति की चाल, चेहरा और चरित्र तो अब भयावह हो चुके हैं| कवि इसी कटु यथार्थ को बेनकाब करते हुए कहता है-

मेरे समानधर्मा

भोगना चाहो सत्ता सुख

तो क्रेडिबिलिटी की चिंता छोडो

और/बन जाओ अंगूठे|

फिर देखना

कैसे सत्ता

तुम्हारे गिर्द घूमती है|

 

और दुनिया की हर शै

तुम्हारे चरण चूमती है|

कवि व्यक्तिगत जीवन में मन, वचन और कर्म से सामाजिक उत्थान के लिए प्रयासरत रहा है, इसलिए उनकी कवितायेँ भी सामाजिक सरोकारों से सम्बद्ध हैं| कवि ने देखे-भोगे सच को कविताओं में अभिव्यक्त किया है, केवल कोरी कल्पनाएँ नहीं की| इसलिए उनकी हर कविता किसी न किसी रूप में सामाजिक सरोकारों से जुडी है| कहीं ये कवितायेँ सामाजिक विद्रूपताओं को बेनकाब करती हैं तो कहीं अंतिम व्यक्ति की पीड़ा को पाठकों के सामने लाती हैं|

कुल मिलकर यह कहा जा सकता है कि डॉ.जे.एस.यादव जी सामाजिक सरोकारों के कवि हैं और यही उनकी रचनाओं की खूबसूरती भी है|

रघुविन्द्र यादव

संपादक, बाबूजी का भारतमित्र

शोध और साहित्य की राष्ट्रीय पत्रिका

प्रकृति-भवन, नीरपुर, नारनौल (हरियाणा) 123001

9416320999