*नैतिकता की कसौटी पर रायपिथौरा*

पृथ्वीराज  तृतीय ‘ राय पिथौरा’ चौहान वंश के अंतिम यशस्वी सम्राट तथा उस युग के राजपूतों के शौर्य के प्रतीक थे। वह अजमेर के शासक सोमेश्वर का पुत्र तथा अर्णोराज का पौत्र था। अजमेर के राजा सोमेश्वर का विवाह, दिल्ली के तुवंर ( तोमर) राजा अनंगपाल की पुत्री कर्पूर देवी से हुआ था । राजा अनंगपाल की दूसरी पुत्री सुंदरी का विवाह कन्नौज के शासक गहरवार ( राठौर) वंशीय विजयपाल सिंह से हुआ और इस संयोग से जयचंद राठौर उत्पन्न हुए। अतः पृथ्वीराज तथा जयचंद परस्पर मौसेरे भाई थे तथा राजा अनंगपाल के नाती थे। राजा अनंगपाल का कोई पुत्र न था । अतः उन्होंने अपने नाती पृथ्वीराज को गोद ले लिया। इस तरह पृथ्वीराज अजमेर तथा दिल्ली के शासक बन गए। जयचंद को यह नागवार लगा (यह स्वाभाविक मानवीय प्रवृति है ) अतः वह मन में,पृथ्वीराज से ईर्ष्या पाल बैठा। कालांतर में दोनों में शत्रुता बढ़ती गई। इतिहासज्ञों के अनुसार उस समय उतर भारत में दो मुख्य साम्राज्य थे। चौहानों का राज्य दिल्ली से अजमेर तक का पश्चिमी क्षेत्र था तथा राजपूताने पर भी उनका प्रभाव था।
गहरवारों ( राठौरो ) का विशाल साम्राज्य जिसकी राजधानी कन्नौज थी, के अंतर्गत सारा मध्य देश काशी से कन्नौज तक था तथा बुंदेलखंड के शासक परमार्दिदव (परमालदेव ) कन्नौज के राजा जयचंद के सामंत थे या मित्र थे। गहरवारों की दूसरी राजधानी काशी थी। इन दोनों साम्राज्यों में गहरवार नरेश जयचंद का साम्राज्य बड़ा तथा सम्भ्रांत था।जयचंद कन्नौज के राजा के साथ ही ‘काशीराज’ भी कहलाते थे।
एक बार राजा जयचंद ने ‘राजसूय यज्ञ’ का आयोजन किया तथा सभी राजाओं को यज्ञ में भिन्न भिन्न कार्य करनें के लिए आमंत्रित किया। सभी राजा आये परन्तु दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चौहान नही आएं। इससे जयचंद बहुत नाराज हुए तथा पृथ्वीराज को अपमानित करने के लिए, द्वारपाल के स्थानक पर ,पृथ्वीराज की आदमकद मूर्ति लगवा दी। राजसूय यज्ञ के अवसर पर ही, जयचंद ने अपनी पुत्री संयोगिता का स्वयंवर भी रच दिया। संयोगिता पहले से ही पृथ्वीराज पर अनुरक्त थी। संयोगिता जयमाल लेकर रंगभूमि में आई तथा उसने वरमाला पृथ्वीराज की मूर्ति के गले में डाल दी। पुत्री की धृष्टता से अप्रसन्न जयचंद ने उसे तुरन्त महल से निष्कासित करके गंगा किनारे के महल में एकांतवास में भिजवां दिया। योजना के अनुसार पृथ्वीराज के सामंतों ने धावा बोलकर राजसूय यज्ञ का विध्वंस कर दिया। यज्ञ स्थल पर ही युद्ध शुरू हो गया। दूसरी ओर चुपके से पृथ्वीराज ने कुछ चुनें हुए सैनिकों के साथ गंगा किनारे के महल पहुँच कर संयोगिता का हरण कर लिया तथा दिल्ली की ओर भाग निकला। जयचंद की सेनाओं तथा पृथ्वीराज के सैनिको के बीच भयंकर युद्ध हुआ।युद्ध में पृथ्वीराज के 150 सामंत मारें गये, पृथ्वीराज किसी तरह संयोगिता को लेकर बच निकला। असंख्य सैनिकों की कुर्बानी दे कर दिल्ली पहुँचा ‘चौहान राजा’ राजकाज तथा राज्य की सुरक्षा को भुला कर रतिविलास में लिप्त रहनें लगा। पृथ्वीराज के इस निहायत उतरदायित्व हीन आचरण और असहाय प्रजा के मन बढ़ती असुरक्षा और विवशता का वर्णन चंद्रबरदायी ने ‘पृथ्वीराज रासो ‘ में किया हैं
  ‘ मिलिय सकल  एकांत महाजन । किमि बुज्झैं रतिवन्तौ राजन ‘
चंद्र बरदायी की कृति’ ‘पृथ्वीराजरासो ‘ को विद्वानों ने तथ्यों के आधार पर इतिहास मानने से मना कर दिया। लेकिन जनता में इसकी लोकप्रियता के कारण लोग इसे इतिहास मान बैठें। अतः ‘पृथ्वीराज रासो ‘ में वर्णित घटना के आधार पर ही पृथ्वीराज’ ‘रायपिथौरा ‘ को नैतिकता की कसौटी पर जांचना आवश्यक हो गया है।   राजा समाज से ऊपर नही हो सकता। शासन करने के लिए समाज की जरूरत होती है। बिना प्रजा के, राजा कैसा?
राम अयोध्या के राजा थे। उन्होने स्वयं को समाज के नियम / प्रचलन / नैतिकता से ऊपर नही माना। उनका कठोरता से पालन किया। अतः राम का चरित्र, मनुष्य के रूप में तथा राजा के रूप में भी अनुकरणीय है।
यह स्पष्ट है कि  ‘पृथ्वीराज रासो ‘ में वर्णित महिमामंडन के आधार पर ही पृथ्वीराज चौहान का मूल्याकंन होता रहा है लेकिन ‘रायपिथौरा’ के जीवन में नैतिक मूल्यों अभाव हैं।
यह सर्वविदित हैं कि पृथ्वीराज चौहान तथा जयचंद मौसेरे भाई थे। अतः राजा जयचंद की पुत्री संयोगिता , पृथ्वीराज की भतीजी लगती थी। पृथ्वीराज का भतीजी संयोगिता का हरण तथा विवाह करना, यह कृत्य नैतिक तो कतई नही है । एक स्त्री को पाने के लिए, कामांध राजा द्वारा, युद्ध में 150 वीर सामंतो को को गंवा देना न तो नैतिक है नही राज्य के हित में था।
यहाँ यह भी स्पष्ट करना उचित है कि पृथ्वीराज तथा मौहम्मद गौरी के बीच सन् 1191 मे हुए प्रथम तरावड़ी के मैदान में हुए प्रथम युद्ध में अन्य हिन्दू राजाओं के साथ राजा जयचंद ने भी पृथ्वीराज की ओर से भाग लिया था। युद्ध में भारी पराजय के बाद मौहम्मदगौरी को जान बचाकर भागना पड़ा। महाराजा जयचंद द्वारा युद्ध में की गई सहायता को भुलाकर, उनकी पुत्री संयोगिता का हरण और उससे विवाह रचाना ; राजा जयचंद के साथ विश्वासघात तथा उनको अपमानित करना ही तो था। पृथ्वीराज के विश्वासघात तथा अनैतिक कृत्य से अन्य हिंदू राजा भी नाराज हो गये । पृथ्वीराज का यह कृत्य कूटनीतिक व नैतिक दृष्टि से कतई उचित नही था।
‘पृथ्वीराज रासो ‘ के अनुसार पृथ्वीराज की तेरह रानियां थी। जिनके नाम जमभावती पणिहारी, पवारी इच्छानी, दाहिया, जालंधरी, गूजरी,बड गूजरी, यादवी पद्मावती, यादवी शशि प्रभा, कछवाही, पुडीरनी, शशि व्रता, इंद्रावती, संयोगिता गाहड़वाल थे,
सुंदर स्त्रियों से विवाह करने की चाह में ,उसने अनेक युद्ध लड़े ।जिनमें हजारो सैनिकों की जानें गई। केवल अपनी लालसाओं की पूर्ति के लिए, युद्धों में सैनिकों को खो देना ,राज धर्म के विरुद्ध तो है ही, अनैतिक भी है। इसलिए मेरा मानना है सामाजिक मान्यताओं और  हिंदुत्व के नैतिक मूल्यों को देखते हुए रायपिथौरा  नैतिकता की कसौटी पर खरें नही उतरते है।
*अशोक वशिष्ठ*

All Time Favorite

Categories