परिवर्तन प्रकृति का नियम है

यह पुरानी कहावत है कि परिवर्तन प्रकृति का नियम है। यदि हम ध्यान से सोचें तो गति ही परिवर्तन का कारण है। यह स्पष्ट है कि प्रत्येक प्रभाव का कारण उसका उद्गम बीज है। बीज कारण है ,पौधे और वृछ  प्रभाव हैं अर्थात बीज से ही पौधे और वृछ  होते हैं। ये शनैः शनैः बढ़ कर हमें फल और फूल प्रदान करते हैं। फल और फूल के बीज, बारम्बार इस प्रक्रिया को दोराहते रहते हैं।
परिवर्तन प्रकृति का नियम है
प्रकृति का स्वभाव है सदैव गतिमान रहते हुए अग्रसर होना। ब्रह्माण्ड में अधिकांश गृह जैसे मंगल ,बुध ,गुरु ,शनि आदि अपनी-अपनी  धुरी पर घूमते हुए सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाते हैं और सूर्य भी अपनी धुरी पर घूमता है। पृथ्वी की दो गतियां हैं ,घूर्णन (rotation) और परिक्रमण (revolution) ;  घूर्णन को दैनिक गति कहते हैं जबकि परिक्रमण को वार्षिक गति। पृथ्वी अपनी धुरी पर वामवृत दिशा  (anticlockwise direction) में 15  डिग्री प्रति घंटे की दर से घूमते हुए 24  घंटे में अपनी घूर्णन गति पूरी कर लेती है। इस गति के कारण ही दिन और रात होते हैं।
पृथ्वी ,सूर्य की परिक्रमा एक वर्ष (365.25 दिन )में पूरी कर लेती है। इस चक्राकार परिक्रमा के कारण ही ग्रीष्म , वर्षा ,शरद और शीत जैसी ऋतुएं होती हैं। इस जलवायु परिवर्तन के कारण ही पृथ्वी पर जीवित प्राणियों को आवश्यकतानुसार उपयुक्त अन्न प्राप्त होते हैं। भोजन के रूप में इनका सेवन ही हम सब को जीवित रखता है। भोजन के गतिमान  पाचन शक्ति से ही हमारे शरीर में सात धातुएं जैसे रस ,रक्त ,मांस ,वसा ,अस्थि ,मज्जा और शुक्र बनते हैं जो स्वस्थ शरीर का निर्माण करते हैं। शरीर के द्वारा त्यागे हुए व्यर्थ पदार्थ जैसे मल ,मूत्र ; पौधों के लिए खाद निर्माण में सहायक होते हैं जो प्रकृति के परिवर्तन को ही दर्शाते हैं।
दृश्यमान वस्तु या अदृश्यमान शक्ति का मूल मापदंड अंतरिछ और समय है। यहां से द्वैतवाद का जन्म होता है। परिवर्तन प्रकृति का नियम है गर्भ में बच्चे के शरीर का निर्माण 9 माह समय ,बीज से पौधे और वृछ बनने की अवधि ,समय की गति द्वारा ही निर्धारित होती है। विभिन्न महीनों में दिनों की संख्या ,अमावस्या से पूर्णिमा तक शुक्ल पछ ,पूर्णिमा से अमावस्या तक कृष्ण पछ ,सूर्य का उत्तरायण और दच्छिणायन में भ्रमण ,जीव -जन्तुओं के जन्म और मृत्यु  का अन्तराल ,घड़ी द्वारा ज्ञात घंटे ,मिनट और सेकंड आदि समय की गति का ही परिणाम है जो प्रकृति के परिवर्तन को दर्शाते हैं। जीवन यात्रा में विभिन्न अवस्था  परिवर्तन जैसे बाल्यकाल, किशोरावस्था ,युवावस्था ,प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था ;मानव शरीर की  कोशिकाओं में लगातार उत्थान और पतन के ही कारण होता है।
पौधों में प्रकृति की गति का आश्चर्यजनक परिवर्तन देखिए। सूर्य के प्रकाश में प्रकाश –
परिवर्तन प्रकृति का नियम है
संश्लेषण (photosynthesis) द्वारा पौधे ,अपना आहार ग्लूकोज़ तथा ऑक्सीजन गैस उत्पन्न करते हैं। ऑक्सीजन गैस को  हम हवा के रूप में सांस लेते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड गैस को श्वास द्वारा बाहर निकालते हैं जिसे पौधे पुनः ग्रहण कर संश्लेषण की प्रक्रिया को बारम्बार दोहराते रहते हैं।
यह प्रक्रिया सूर्य के प्रकाश में स्वतः होती रहती है। सूर्य अस्त के बाद रात्रि में पौधे अन्य जीव -जन्तुओं की ही भांति ऑक्सीजन गैस स्वयं लेते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड गैस को बाहर निकालते हैं। प्रकृति के तीन परिवर्तनशील गुण सात्विक (purity),राजसिक(activity) और तामसिक (inertia) हैं जो हम प्राणिओं के जीवन में नित्य घटित होते रहते हैं। प्रत्येक व्यक्ति प्रातःकाल स्नान करके अपने इष्टदेव की पूजा -उपासना करता है। दिन में अपनी जीविका चलाने में व्यस्त रहता है और रात्रि को निद्रा पूरी करने के लिए सो जाता है। इस प्रकार प्रकृति हमें स्वयं परिवर्तन के सिद्धांत अनुसार चलने हेतु गतिमान रखती है। शास्त्रों के अनुसार चारों युग क्रमशः
सतयुग ,त्रेतायुग ,द्वापरयुग और कलियुग ,समय की गति द्वारा प्राकृतिक परिवर्तन कोपरिवर्तन प्रकृति का नियम है
दर्शाते हैं। हिन्दू धर्म का महान ग्रन्थ श्रीमद भगवदगीता हमें सदैव कर्म ,ज्ञान और भक्ति
योग के माध्यम से स्वयं को स्वयं द्वारा जानने हेतु गतिशील रखने की शिक्षा देती है और
द्वैतवाद रुपी अज्ञानता को दूर कर अद्वैतवाद रुपी ब्रह्म ज्ञान प्राप्त कर मोक्ष द्वारा  सच्चिदानन्द बनने की प्रेरणा देती है।
आइये हम  सब इस नश्वर और चणभंगुर मायावी संसार की परिवर्तनशीलता को समझें
और आत्मा के प्रधान 7 गुण शान्ति ,प्रसन्नता ,प्रेम ,शक्ति ,ज्ञान ,शुद्धता और आनन्द को
अपने -अपने जीवन की सुगन्धित बगिआ को खुशबू से बिखेर दें और अपने -अपने जीवन को धन्य बनाएं। अन्त में मैं अपनी लेखनी को यह कह कर विराम देता हूँ कि गतिशीलता ही जीवन चेतना का सार है और स्थिरता मृत्यु जड़ता का प्रतीक है।
सतीश चन्द्र पुरी ,
अवकाश -प्राप्त प्राध्यापक ,रसायन विभाग ,डी. ए .वी .कॉलेज ,जालन्धर (पंजाब )

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Anupreet Kaur

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