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बैकों को स्वायत्ता

 

अनमोल रतन नारंग

अर्थव्यव्स्था की हालत ख़राब है यह तो अब सर्व विदित है। परंतु दुःख की बात तो यह है की हालत दिन ब दिन बिगड़ते जा रहे है । वित मंत्री महोदय ने बताया है की उनका कार्यालय, प्रधान मंत्री जी के कार्यालय से लगातार बात चीत कर रहा है और सेक्टर स्पेसिफ़िक क़दम उठाएँ जाएँगे।
परंतु इस पेपर की माध्यम से जो बात हम पाठकों से करना चाहते हैं उसका अर्थव्यवस्था से तो लेना देना तो है पर सेक्टर विशेष की बात नहीं है।
फ़रवरी २०१९ से अगस्त २०१९ तक रिज़र्व बैंक ने रेपो रेट मैं ४ बार कमी करी- पहले ३ बार ०.२५% की और आख़िरी बार ०.३५% की । जब भी रिज़र्व बैंक रेपो रेट मैं कमी करती है तो वह बैंकों को यह संकेत देती है की वह भी अपने ब्याज दरों मैं कमी करें । अर्थशास्त्रियों का विचार है की क़र्ज़ों पर ब्याज दर कम करने से उद्योगपतियों की लागत मैं कमी आती है और उनकी प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता बड़ती है जिसके फलस्वरूप उत्पाद मैं वृद्धि होती है । परंतु ऐसा देखाजा रहा है की रेपो रेट कम करने के बाद भी बैंकों ने अपने ऋणों पर ब्याज दर कम नहीं करी । अतः जिस मंशा के साथ रिज़र्व बैंक ने रेपो रेट मैं कमी करी थी वह पूरी नहीं हो पायी ।
Gross Domestic Product मैं वृद्धि ना होना, और बेरोज़गारी मैं वृद्धि होने से देश मैं व्याकुलता बड़ रही है । ऐसी हालत में सरकार ने दुखी होकर अपना ग़ुस्सा बैंकों पे निकलना शुरू कर दिया है। रिज़र्व बैंक के गवर्नर ने बैंकों के बड़े अधिकारियों से मिलकर अपने ग़ुस्से का इज़ह्हार किया कि की रेपो रेट के कम करने के बाद उन्होंने ऋण दर मैं कमी का लाभ ग्राहकों तक क्यों नहीं पहुँचाया ? रिज़र्व बैंक के गवर्नर देश की मौद्रिक पॉलिसी के मालिक है और भली भाँति जानते है की रेपो रेट मैं कमी करने के बावजूद भी बैंकों ने अपने ऋणों की ब्याज दर मैं कमी क्यों नहीं की । बैंकों के एन पी ऐ इतने ज़्यादा बड़ चुके है की उनकी ब्याज की आय बहुत घट गयी है। इसके विपरीत ब्याज ख़र्चो मैं उतनी गिरावट नहीं आयी है । इसका सीधा असर यह हुआ है की बैंकों की लाभप्रदता बहुत कम हो गयी है । कुछ देर पहले तक तो पब्लिक सेक्टर के अधिकतर बैंक Prompt Corrective Action ( तत्काल सुधारात्मिक प्रक्रिया ) के अंतर्गत आ गए थे। अभी भी स्तिथि कोई सुधरी नहीं है। बैंकों के एन पी ऐ अभी भी चरम सीमा पर है और यदि बैंकों ने कोई कारगर क़दम नहीं उठाए तो स्तिथि और ख़राब हो सकती है । रिज़र्व बैंक के गवर्नर का बैंकों को संकेत देना तो ठीक है पर उन्हें ऋण दरों में कमी करने के लिए मजबूर करना कहाँ तक तर्क संगत है । एक तरफ़ तो गवर्नर महोदय और सरकार, बैंकों को अपने तुलन पत्र (बैलेन्स शीत) मैं सुधार लाने की बात कहती है और दूसरी तरफ़ उनको रेट तह करने की आज़ादी से वंचित कर रही है । ऐसा कैसे हो सकता है की बैंक क़र्ज़ों पर तो ब्याज दर आर बी आयी कि मर्ज़ी से रखे और लाभप्रदता के रिज़ल्ट भी उनके अनुसार दें ।
इस समय मन्दी का दौर चल रहा है और यह मन्दी सबसे ज़्यादा ऑटो सेक्टर मैं नज़र आ रही है । मारुति, Hyundai की बिक्री में बहुत कमी आयी है । दुपहिया और त्रिपाहिया वाहनों की बिक्री मैं भी कमी देखी जा रही है । इससे ऑटो पार्ट्स बनाने वाली कम्पनीज़ की बिक्री मैं कमी आना स्वाभाविक है। इन कम्पनीज़ की सेल्ज़ मैं कमी आने से और उनकी बैलेन्स शीट्स मैं कमज़ोरी आने से इन कम्पनीज़ के बैंकों ने इन्हें, आपने आप को सुरक्षित करने के लिए, २५% से ५०% की अतिरिक्त कलैटरल की माँग कर रहे है । आख़बरों की ख़बरों की अनुसार सरकार, बैंकों को हिदायत दी जा रही है की वह इन कम्पनीज़ से अतिरिक्त कलैटरल की माँग ना करे । इसका परिणाम यह होगा की जब इनमे कुछ खाते एन पी ऐ बन जाएँगे तो सारा दोष बैंक वालों पर डाल दिया जाएगा और बैंक वालों को अकुशल, और अक्षम क़रार दे दिया जाएगा।
किसी भी अर्थव्यवस्था की लिए मज़बूत बैंकों और वित्तीय संस्थानों का होना बहुत अनिवार्य है । बैंकों और वित्तीय संस्थानों की वर्तमान हालत अछी नहीं है । रिज़र्व बैंक के गवर्नर साहिब नान बैंकिंग फ़ायनैन्शल संस्थाओं का संपती गुणवत्ता जाँच ( Asset Quality Review) करने से कन्नी क़तरा रहें है । आई एल एफ एस के घोटाले के बाद गवर्नर साहिब को डर है की यदि जाँच करायी गयी तो बहुत से कंकाल बाहर आएँगे जिससे अर्थव्यवस्था मैं और निराशा का माहौल बनेगा ।
भारत सरकार को चाहिए की (१) वह बैंकों को स्वतव अधिकार (autonomy) दे और उनके काम काज मैं दख़ल अंदाज़ी बंद करे और (२) एन बी एफ सी की सम्पत्ति गुणवत्ता जाँच बिना किसी देरी के करवाए ताकि देश की अर्थव्यव्स्था की सही पिक्चर सामने आए ।
अनमोल रतन नारंग
प्रिन्सिपल (सेवा निवृत)
स्टाफ़ ट्रेनिंग कॉलेज,
UCOBANK,
चंडीगढ़

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