Haryana

मनेठी का एम्स बना दक्षिणी हरियाणा की सियासत का केंद्र बिंदु

 

बी.एल. वर्मा द्वारा :
नारनौल, 11 सितंबर 2019।:मनेठी एम्स अब एक सुविधा या मुद्दा भर न रहकर दक्षिणी हरियाणा की सियासत का केंद्र बिंदू बनता जा रहा है। गौरतलब है कि पिछले पांच वर्ष से एम्स मनेठी का मुद्दा केंद्र और राज्य सरकार के बीच टेनिस की गेंद की तरह एक पाले से दूसरे पाले में खेली जा रही है। यह तो तब है जब केंद्र और राज्य दोनों जगह भाजपा की ही सरकारें है।
एम्स की घोषणा 5 वर्ष पूर्व बावल की मीटिंग में चुनाव की सफलता में भावुक होकर मुख्यमंत्री ने की थी, जिसे तीन वर्ष बाद धारूहेडा की मीटिंग में नकार दिया। एम्स बनवाने के लिए संघर्ष समिति बनी। जिन्होंने हर स्तर का आंदोलन चलाया। केंद्र सरकार ने आर्डिनेंस जारी करते हुए अंतरिम बजट में एम्स मनेठी के लिए धन का आंवटन भी कर दिया। जिसका पार्लियामेंट चुनाव में पूरा दोहन नहीं किया गया। ऐसा लगने लगा कि पूरा संघर्ष राजनैतिक उद्देश्यों की आपूर्ति के लिए ही चल रहा था।
हरियाणा में सभी दस सीटें भाजपा मिल गई। केंद्र में भाजपा स्थापित हो गई और आंदोलन केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत सिंह के कहने से उठा लिया गया।

अब एम्स का निर्माण फिर अटक गया, क्योंकि हरियाणा सरकार के वन विभाग ने पर्यावरण ना की आपत्ति लगा दी है। मुख्यमंत्री और केंद्र सरकार के मंत्री ने मंच साझा किया, तो मुख्यमंत्री ने एम्स के लिए किसानों द्वारा सरकारी रेट पर जमीन देने का सुझाव भी दे डाला। अब कुछ प्रश्न उठते हैं। क्या सरकार के आर्डिनेंस का कोई मतलब नहीं, क्या केंद्रीय बजट में पैसा पास हो जाना बाल क्रीडा होती है, क्या राज्य सरकार एम्स मुद्दे पर केंद्र सरकार के आदेश को पर्यावरण नाम के पचड़े में डालकर टकराव चाहती है, क्या किसी मंत्री और राज्य सरकार की मूंछे टकरा रही है। ये अहम अनुतरित सवाल सरकारों की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर रहे हैं।
हरियाणा सरकार का रास्ता अहीरवाल के गेट से होकर जाता है। देवीलाल का जलयुद्ध हो या बंसीलाल की विकास यात्रा, राव बीरेंद्र सिंह का विशाल हरियाणा का मुद्दा हो चाहे फिर न्याय युद्ध तथा जल युद्ध। अहीरवाल हरियाणा के लिए वहीं काम करता है जो केंद्र सरकार के लिए उत्तर प्रदेश करता है। यदि मनेठी एम्स मुद्दे पर आमजन की राय जाने तो ऐसा लगेगा, जैसे जीमने वाले के सामने से पत्तल उठा ली गई अर्थात खाना खाने वाले के सामने से भोजन की थाली उठा ली गई हो। अत्याधिक अपमान राजनैतिक आक्रोश में बदल सकता है। भाजपा की राज्य इकाई को सैद्धान्तिक स्पष्टïता से दूर नहीं जाना चाहिए। वैसे बिखरे हुए पानी को एक नाले में लाना बहुत कठिन है। राजधानी दिल्ली के निकट मनेठी में दूसरा एम्स होना आपतकालीन स्थिति में एक पूरक का काम करेगी। उदाहरण के लिए पिछले दिनों जब एम्स में आग लगी तो ऐसे समय उपचाराधीन मरीजों को दूसरे नजदीकी एम्स में शिफ्ट किया जाना आवश्यक हो गया था। इसलिए समय रहते राज्य सरकार को चुनाव पूर्व मनेठी के एम्स मामले को सुलझा लेना चाहिए।

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