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*मानक कुंडलिया : यथा नाम तथा गुण*

*मानक कुंडलिया : यथा नाम तथा गुण*

*मानक कुंडलिया : यथा नाम तथा गुण*

*सत्यवीर नाहड़िया*
दोहा और रोला के मेल से बना मात्रिक छंद कुंडलिया आजकल खूब लिखा जा रहा है, किंतु व्याकरण की दृष्टि से आज भी मानक कुंडलिया छंद बेहद कम लिखा जा रहा है। इस कमी को पूरा करने के लिए जाने-माने दोहाकार एवं कुंडलियाकार रघुविंद्र यादव के संपादन में मानक कुंडलिया नामक कुंडलियां संकलन प्रकाश में आया है, जिसमें करीब दो दर्जन रचनाकारों की संबंधित मानक रचनाओं को स्थान दिया गया है।
शोध एवं साहित्य की राष्ट्रीय पत्रिका बाबूजी का भारतमित्र के संपादक के तौर पर पहले भी कुंडलिया विशेषांक निकाल चुके श्री यादव ने इस संकलन में जिन रचनाकारों  को शामिल किया है, उनमें उनके अलावा डॉ. तुकाराम वर्मा ,त्रिलोक सिंह ठकुरेला ,अरुण कुमार निगम ,वैशाली चतुर्वेदी संजय तन्हा, तारकेश्वरी सुधि,परमजीत कौर रीत, टीकमचंद ढोडरिया ,डॉ जे पी बघेल ,डॉ. गोपाल राजगोपाल ,डॉ ज्योत्स्ना शर्मा, शिव कुमार दीपक, सत्यवीर नाहड़िया,पुष्पलता शर्मा, साधना ठकुरेला राजपाल सिंह गुलिया, नफेसिंह निष्कपट, अनामिका सिंह अना, बाबा बैजनाथ झा, संतोष कुमार प्रजापति, तथा पंकज परिमल के नाम उल्लेखनीय हैं। सभी रचनाकारों की 15-15 रचनाओं को शामिल किया है, जिससे एक और जहां रचनाधर्मिता का फलक विस्तृत हो गया है ,वहीं दूसरी ओर मानक कुंडलिया का मूल स्वरूप उभरकर सामने आया है। कबीर पुरस्कार से अलंकृत वरिष्ठ रचनाकार डॉ. तुकाराम वर्मा का
एक छंद दृष्टव्य है-
भूखे को भोजन मिले, प्यासे को हो नीर ।
सिर के ऊपर छत रहे, तन ढकने को चीर।।
 तन ढकने को चीर, सुशिक्षा मिले जरूरी। स्वास्थ्य हेतु सरकार, दिखाए मत मजबूरी। गुजरे पैंसठ साल ,सुने हैं भाषण रूखे ।
कई करोड़ों लोग, अभी तक प्यासे भूखे।।
राष्ट्रीय स्तर पर दोहा तथा कुंडलिया रचनाधर्मिता में विशिष्ट स्थान बना चुके श्री यादव ने संपादकीय में मानक कुंडलिया के बहुआयामी पक्षों पर बेहद रोचक जानकारी सरल भाषा में दी है।
प्रख्यात चित्रकार डॉ लाल रत्नाकर के कलात्मक आवरण से सजा यह संकलन डिजिटल प्रिंटिंग के चलते बेहद सुंदर बन पड़ा है। नीरपुर, नारनौल के आलोक प्रकाशन का 96 पृष्ठों के इस नवाचारी प्रयोग की कीमत ₹200 उचित ही है। संकलन में संपादकीय की भांति कुंडलिया छंद विधान पर एक दो और आलेख अपेक्षित थे। नये पुराने रचनाकारों की मानक रचनाओं का यह संकलन कुंडलिया साहित्य को समृद्ध करते हुए विशिष्ट पहचान बनाएगा-ऐसा विश्वास है। सीमित संसाधनों में ऊंचे दर्जे का साहित्य प्रकाशन
करने वाले कुशल संपादक के संपादन कौशल एवं साधना को प्रणाम एवं बधाई!