मोमबती ने ली दीये की जगह, कुम्हारों की रोजी रोटी पर असर

नारनौल में मिट्टी के दीये व बर्तन बेचता कुम्हार समुदाय का एक बच्चा।
-त्योहारों के समय पर मजदूरी मिलना मुश्किल
त्रिभुवन वर्मा द्वारा
नारनौल 6नवम्बर  2018
अपनी उंगलियों की सफाई तथा हथेली की थाप के दम पर अपनी कला के आधार पर हर तरह के मिट्टïी के घरोंदे बनाने की कला के धनी कुम्हार अब अपनी परम्परागत कला व व्यवसाय से लगातार दूर होते जा रहे हैं। एक समय था जब समाज के प्रत्येक वर्ग को न केवल दिवाली बल्कि पारिवारिक अन्य समारोह के समय सामाजिक रीति-रिवाजों को अमली जामा पहनाने के लिए कुम्हारों का याद किया जाता था। कुम्हार न केवल घड़े व झाल ही बनाते थे बल्कि बिलोवणी, कढावणी, छाछ डालने वाली छछूली, घी रखने वाली घीलड़ी, खेतों में पानी ले जाने के लिए छोटे बर्तन के रूप में मांघा, करवे, शिकोरे, दीए, सराई, घरों में अन्य सामान जैसे अनाज तथा आटा रखने के लिए झाकरा तथा दिवाली व अन्य उत्सवों में काम आने वाले तरह-तरह के मिट्टïी के बर्तनों के बिना घरों में काम नहीं चलता था। एक ऐसा भी समय था जब प्लास्टिक का आगमन नहीं हुआ था, उस समय कुम्हार बच्चों के लिए अनेक प्रकार के खिलौने जैसे सीटी, पपैया, गाड़ी तथा मिट्टïी के जानवर आदि भी बनाकर मेलों आदि में बेच कर अपना गुजारा करते थे। आज प्लास्टिक ने उक्त सभी तरह के सामान को भुलाकर रख  दिया है। उक्त सभी सामान की मांग नहीं होने के कारण आज की पीढ़ी तो उक्त बर्तनों के नाम तक नहीं जानती। आधुनिकता की इस अंधी दौड़ तथा हर तरह के सस्ते सामान की बाजार में उपलब्धता ने कुम्हारों को याद तक करना बंद कर दिया है। इसका सीधा सा असर यह हुआ है कि समाज का एक महत्वपूर्ण वर्ग जिसमें कुम्हार आते हैं, उसका धंधा अंतिम सांस ले रहा है। आज का कुम्हार मिट्टïी के बर्तनों की घटती मांग को देखते हुए बेरोजगार हो चला है। \
नारनौल मेें एक कुम्हार द्वारा अपने घर में सुखाए हुए दीये।
नवीनतम कला को नहीं दिया कुम्हारों ने महत्व- कुम्हारों के धंधे को चौपट होने का मुख्य कारण यह भी है कि उक्त वर्ग ने बदलते परिवेश तथा बदलती लोगों की मांग के अनुसार अपनी कला में बदलाव नहीं किया। यदि कुम्हार अपनी कला में बदलती मांग के अनुसार बदलाव किया होता तो आज भी ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो कि मिट्टïी के बर्तनों को महत्व देते हैं। यदि प्लास्टिक के सामान की नवीनतम डिजाइन के अनुसार कुम्हार नवीनतम कला को सीखते तो आज कुम्हारों की यह दुर्दशा नहीं होती।
महंगाई की मार तथा मेहनत ने भी किया बेरोजगार-प्रकृति का नियम है कि लोग बदलाव को पसंद करते हैं तथा पुराने डिजाइन के सामान से ऊब जाते हैं। लेकिन कुम्हारों को मिट्टïी के बर्तन बनाने के लिए केवल हाथ का प्रयोग ही ज्यादा किया जाता है। जिस कारण उसे मेहनत ज्यादा तथा आमदनी कम होती है। मशीन के रूप में आज तक कुम्हारों ने बिजली से चलने वाले चाक का प्रयोग ही करना शुरू किया है। शेष काम जैसे मिट्टïी तलाश करना, उसे हाथ से कूटकर छानना, उसे रौंदना तथा अपनी पसंद का सामान बनाना आदि सभी काम हाथों से करने पड़ते हैं। इस कार्य में कुम्हार का पूरा परिवार लगा रहता है। इस सबके बावजूद त्योहारों के समय भी परिवार की मजदूरी बड़ी मुसकिल से मिल पाती है। अनेक बार तो यह भी देखा गया है कि कुम्हार को उसकी मजदूरी भी नहीं मिलती। इसके साथ ही गांवों व शहरों में चिकनी मिट्टïी का अभाव होने लगा है। जिस तरह की कुम्हारों को बर्तन बनाने के लिए मिट्टïी की आवश्यकता होती है, उस तरह की मिट्टïी कहीं नहीं मिलती। ऐसी स्थिति में कुम्हारों को मजबूरी में अपना व्यवसाय छोडऩा पड़ रहा है। इसका सीधा परिणाम यह निकला है कि अधिकांश कुम्हार अपना पैतृक व्यवसाय छोडऩे लगे हैं। कुछ गिनेचुने कुम्हार बचे हैं वे भी अब अपना व्यवसाय ज्यादा दिनों तक नहीं कर पाएंगे।
तेजी से बदला व्यवसाय-चकाचौंध तथा दिखावे वाली संस्कृति बड़ी तेजी से बदल रही है। इसी कारण से दीपावली पर जलाएं जाने वाले खुशियों के दीयों का स्थान अब मोमबत्तियों ने लेना शुरू कर दिया है। इससे कुम्हार समुदाय के लोगों कि रोजी-रोटी पर भी सीध असर पड़ रहा है।
क्या कहते हैं कुम्हार समाज के लोग-आज के इस दौर में गांवों में तो अधिकांश कुम्हारों ने अपना परम्परागत काम छोड़ दिया है। लेकिन कुछ गिनेचुने गांवों में वृद्ध लोग तथा शहर में कुछ परिवार उक्त व्यवसाय को अपनाए हुए हैं। शहर के नलापूर मोहल्ला निवासी रमेश उसकी पत्नी पुजा तथा अशोक आदि ने बताया कि दिवाली पर दीये जलाने का पुरानी परम्परा रही है। दिवाली के दिन आम लोग अपने घरों में मिट्टïी के दीये ही जलाते थे, इस समय बिजली की लडिय़ां तथा मोममत्ती का चलन काफी कम होता था। लेकिन आज समाज में काफी बदलाव आ गया है। बदलते समय के साथ-साथ दीये जलाने का रिवाज भी बदल गया। अब तो ऐसे लोगों की संख्या काफी ज्यादा हो गई है जो अपने घरों में तेल के दीये भी नहीं जलाते। लोग मोमबत्ती आदि जलाकर ही खुशी व्यक्त करते हंै। कुम्हार जगदीश, सीताराम तथा राजेश आदि ने बताया कि एक वक्त था जब दीपावली के दिन इतने दिये बिकते थे कि उनके परिवार का गूजर-बसर आसानी से हो जाता था। परंतु अब तो रोजी-रोटी के भी लाले पड़ गए हैं। पहले उनके मोहल्ले में लगभग 80 कुम्हारों के परिवार यह काम करते थे, लेकिन अब यह संख्या 10 तक ही सिमट कर रह गई है। कुछ कुम्हारों ने तो अपना धंधा ही बदल लिया है। कुछ कुम्हार दीये खरीदकर लाते है और उन्हें घर-घर जाकर बेचकर अपने परिवार का लालन-पालन करते हैं। मोमबत्ती कि जगह पर छोटे-छोटे चाइनीज बल्ब लगाकर दीपावली की रौनक बढ़ाते का चलन भी बढ़ गया है।
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