JNU में हुई वामपंथी चाचा-चाचियों की चकाचक धुलाई के बाद

JNU में हुई वामपंथी चाचा-चाचियों की चकाचक धुलाई के बाद
मुम्बई में सिनेमा कलाकारों द्वारा विरोध प्रदर्शन किया गया। जिसपर, पूरा सोशल मीडिया उबल रहा है, इसीलिए मैं सोचता हूँ कि इन सब पर लिखने से अच्छा है कि एक कहानी ही सुना दूँ।
एक गाँव में लाजवंती नाम की एक महिला रहती थी। लाजवंती नींबू और चीनी का शर्बत बहुत अच्छा बनाती थी। किसी के जन्मदिन की पार्टी हो अथवा शादी विवाह या फिर कहीं पूजा पाठ हो, हर जगह लाजवंती ही नींबू-चीनी का शर्बत पिलाया करती थी।
धीरे-धीरे बहुत से लोग लाजवंती को जानने लगे और लोगों ने उसके शर्बत बनाने की कला से प्रभावित होकर उसे गांव का मुखिया बना दिया। मुखिया बन गई तो ज़िम्मेदारी भी आ गई। लोग उसके पास अपनी समस्याएं लेकर आते। लाजवंती उन सबको बहुत प्यार से शर्बत पिलाया करती थी।
एक बार गांव में बहुत तेज बारिश हुई और लगभग आधा गांव डूब गया। लोग घबराए हुए मुखिया लाजवंती के पास आये और उसे उस गंभीर स्थिति की जानकारी दी।लाजवंती ने भी पूरी गंभीरता से उन सबकी बात सुनी। उस दिन उसने ढेर सारा शर्बत बनाया एवं सबको पिलाने लगी। इस पर गांव वालों ने गुस्सा करते हुए उससे कहा कि यहाँ हम सबकी जान पर बनी हुई है और आप हमें शर्बत पिला रही हो ??? आप स्थिति की गंभीरता को क्यों नहीं समझती ???
इस पर लाजवंती ने कहा मैं स्थिति की गंभीरता तो समझ रही हूँ, तभी तो आज ढेर सारा शर्बत बनाया है। मुझे यही काम आता है और मैं वही काम कर रही हूँ। मैंने तो ये आप लोगों से कभी नहीं कहा कि आप मुझे मुझे मुखिया बना दो। आप सब ने खुद से मुझे आइकॉन बना रखा है। इसमें भला मेरा क्या दोष है ???
कमोबेश यही स्थिति आज देश की भी है…!
जिन्हें आप अंग्रेजी में सिने तारिका अथवा हीरो कहते हैं।उस कैटेगरी के लोगों को आज भी गांव देहात में “नचनिया” और “लौंडा नाच” कह कर पुकारा जाता है।उनका काम नाच-गा कर आपका मनोरंजन करना एवं बदले में आपसे बख्शीश के तौर पर कुछ पैसे लेना है। जिसे, आप टिकट के तौर पर भुगतान करते हैं। उनका पेशा ही ये है।
अगर आपके पास मुम्बई की फ़िल्म लाइन के लोगों को देने लायक़ पैसा है तो, आप भी अपने घर की शादी, जन्मदिन अथवा किस अन्य फंक्शन में उन्हें कपड़ों के साथ अथवा ना के बराबर कपड़ों में भी नचवा सकते हैं। ऐसे नचनियों , भांडों और लौंडों को अगर  आप अपना आइकॉन मानते हैं तो आपकी बुद्धि की बलिहारी है।
इसके लिए भला उन्हें दोष क्यों देते है ???
जहाँ तक रह गई बात अक्ल की तो KBC में एक नचनिया की “”संजीवनी बूटी वाली बात” बहुत वाइरल हुई थी। उससे पहले एक और नचनिया “देश की राष्ट्रपति”” तक का नाम नहीं बता पाई थी। यहाँ तक कि अभी CAA वाले मैटर में भी एक लौंडा (मर्द नचनिया) ये नहीं बता पाया कि CAA क्या है और वो इसका विरोध क्यों कर रहा है ???
इसीलिए मेरे ख़याल से इन भांडों, लौंडों और नचनियों को सीरियसली लेने जरूरत ही नहीं है क्योंकि उनकी अपनी कोई आइडियोलॉजी नहीं होती है और उन्हें पैसे देकर कोई भी बुला सकता है। हमारा देश ऐतिहासिक रूप से बेहद ही समृद्ध है। अपना हीरो मानने के लिए हमारे पास राम, कृष्ण, अर्जुन, से लेकर राणा सांगा, महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी, सुभाष चंद्र बोस , भगत सिंह, वीर सावरकर जैसे हजारों आइडल हैं।
इन सब को छोड़कर अगर आप फिर भी फिल्मी नचनियों और भांडों को अपना आइडल मानते रहेंगे तो फिर शायद भगवान भी आपका भला नहीं कर पाएंगे।
जय महाकाल…!!!!
Kumar Satish

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